| Jan 01, 1970 | Daily Report |
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20671. वैशाली प्रिया ने बिहार के हरिहरपुर गांव की महिलाओं को केले के तने से कपड़ा बनाना सिखाया, अपने प्रोजेक्ट के जरिये लोगों को दिए रोजगार के अवसर
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
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- अपनी टेक्सटाइल डिजाइनिंग में वैशाली ने कपड़े का सही उपयोग कर कई लोगों को रोजगार के अवसर दिए हैं
- वैशाली ने 'सुरमई बनाना एक्सट्रेक्शन प्रोजेक्ट लॉन्च' किया है। अपने प्रोजेक्ट के माध्यम से वे ग्रामीण महिलाओं को ऑर्गेनिक और नैचुरल फाइबर प्रोडक्ट बनाना सिखाती हैं
- वैशाली कहती हैं ''इस प्रोजेक्ट से होने वाले मुनाफे को देखते हुए इससे और लोग भी जुड़ते जा रहे हैं। यहां महिलाओं को कपड़ा बनाने से जुड़ी कई बारीकियां जैसे कपड़े को भिगोना, बुनना और उसकी प्रोसेसिंग आदि सिखाई जाती है''।
20672. तीन साल पहले कपड़ों का ऑनलाइन बिजनेस शुरू किया, कोरोना आया तो लॉन्च की पीपीई किट, 5 करोड़ रु पहुंचा टर्नओवर
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- दिल्ली की वंशिका ने 2017 में बिजनेस शुरू किया था, आज 200 से ज्यादा होटल्स, स्कूल और रेस्टोरेंट के लिए यूनिफॉर्म तैयार करती हैं, उनके साथ 200 से ज्यादा लोग जुड़े हैं
- दिसंबर 2019 में शादी के बाद वंशिका मुंबई शिफ्ट हो गईं, अभी मुंबई और गुजरात में उनकी कंपनी काम कर रही है
- वंशिका बताती हैं कि लॉकडाउन के दौरान पीपीई किट तैयार करने और उसकी सप्लाई करने में काफी दिक्कत हुई। तब न तो कहीं दुकानें खुलीं थी न ही कोई मजदूर काम करने को तैयार था। एक पॉली बैग के लिए भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी।
20673. इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ घर के गैरेज से ऑनलाइन बेचने लगीं मसाले, 20 लाख रु टर्नओवर, अमेरिका-कनाडा से भी मिले ऑर्डर
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- उनके प्रोडक्ट 100 फीसदी नैचुरल होते हैं, हर चीज घर की इस्तेमाल करते हैं, मसालों के लिए सामान भी गांव से मंगाते हैं ताकि मिलावट नहीं हो
- स्नेहा की कंपनी में 7 लोग काम करते हैं, हर महीने 1000 प्रोडक्ट सेल होते हैं, 50 से ज्यादा टाइप के प्रोडक्ट वे लोग तैयार करते हैं
- स्नेहा बताती हैं कि हमारे प्रोडक्ट 100 फीसदी नेचुरल होते हैं। हम हर चीज घर की इस्तेमाल करते हैं। मसालों के लिए रॉ मटेरियल भी गांव से मंगाते हैं ताकि कहीं से कुछ भी मिलावट नहीं हो। हम लोग इन मसालों में कोई केमिकल या प्रिजर्वेटिव्स भी ऐड नहीं करते हैं। यही हमारा यूएसपी है, जिसे लोग पसंद करते हैं।
20674. पार्किंग शेड में मशरूम उगाकर 2 लाख कमातीं हैं गुजरात की यह इंजीनियर, जानिए कैसे!
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- सिविल इंजीनियर अंजना गामित कहती हैं कि यदि आपको कभी भी अपने घर या बैकयार्ड में खेती करने का विचार आए तो ऑर्गेनिक ऑइस्टर (सीप) मशरूम के विकल्प को चुनें, क्योंकि इसमें कम निवेश में लाभ अधिक है।
- अंजना पिछले 3 वर्षों से मशरूम की खेती कर रही हैं और उन्होंने पिछले साल 2 लाख रुपए से अधिक का मुनाफा कमाया था। सिर्फ इतना ही नहीं, अपने क्षेत्र में इस प्रोटीन युक्त उत्पाद की मांग न होने के बावजूद, वह अपने संभावित खरीदारों का बाजार बनाने में कामयाब रहीं।
- कुछ साल पहले अंजना ने, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) द्वारा आयोजित एक चार दिवसीय कार्यक्रम ‘मशरूम खेती के माध्यम से उद्यमिता विकास’ में हिस्सा लिया था। वहाँ से वापसी के दौरान, उन्हें कुछ स्पॉन (मशरूम के बीज) और पॉलिथीन के बैग मिले थे। इसके बाद, कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों ने अंजना को मशरूम की खेती के लिए सेटअप तैयार करने में मदद करने के साथ ही, शुरुआती दिनों में जरूरी तकनीकि मार्गदर्शन भी किया।
20675. लाखों की नौकरी छोड़ ऑर्गेनिक अमरूद की बागवानी शुरू की, एक सीजन में 12 लाख रु. की कमाई, 5 लोगों को रोजगार भी दिया
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- अच्छे किस्म की अमरूद के पौधे लगभग एक साल में तैयार हो जाते हैं, पहले साल में एक पौधे से 6-7 किलो तक अमरूद निकलता है, उसके कुछ समय बाद 10-12 किलो तक उत्पादन होने लगता है
- आज हर दिन 4 टन अमरूद उनके बगीचे से निकलता है, मुंबई, पुणे, सांगली सहित कई शहरों में वे अमरूद भेजते हैं, हर दिन 10 हजार रु की कमाई हो रही है
- शीतल आज 4 एकड़ जमीन पर अमरूद उगा रहे हैं। 5 लोग उनके साथ काम करते हैं। हर एकड़ में 10 टन अमरूद निकलता है। अभी तीन प्रमुख किस्म ललित, जी बिलास और थाईलैंड पिंक का उत्पादन होता है। ललित की साइज छोटी होती है, जबकि जी बिलास और थाईलैंड पिंक का साइज बड़ा होता है।
20676. इंजीनियर ने नौकरी छोड़ चुनी खेती, शुरू की जीरो बजट फार्मिंग, गोबर से बनाते हैं कीटनाशक
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- मेरठ के कमल प्रताप तोमर ने शुरूआत में छह बीघा जमीन पर जीरो बजट खेती की लेकिन अब वह 12 बीघे में खेती कर रहे हैं।मेरठ के नजदीक सिसौली गाँव के कमल ने 2012 में बीटेक करने के बाद कुछ दिन नौकरी भी की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी का एंट्रेंस टेस्ट दिया। कामयाब हुए, लेकिन उन्होंने आगे की पढ़ाई नहीं की। इसके बाद उन्होंने खेती की शुरूआत की।
- 32 वर्षीय कमल बताते हैं कि उनकी खेती का आधार गाय है। वह कहते हैं, “एक देसी गाय से इतना गोबर मिल जाता है कि पूरे साल बाजार से खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। देसी गाय के एक ग्राम गोबर में तीन सौ से लेकर पांच सौ करोड़ तक माइक्रो बैक्टीरिया पाए जाते हैं। यह खेती के लिए बेहद आवश्यक है। गाय के गोबर और गोमूत्र से कई खाद बनाई जाती है। इसके साथ ही कीटनाशक भी तैयार किए जाते हैं। इनका मकसद कीटों को खत्म करना नहीं, क्योंकि शत्रु कीट होते हैं तो ढेरों मित्र कीट भी होते हैं। यह कीटनाशक शत्रु कीट को फसल खराब करने से रोकते हैं।”
- कमल खेती के लिए जैविक खाद जीवामृत भी खुद ही तैयार करते हैं। दरअसल जीवामृत सुभाष पालेकर जी द्वारा सुझाया गया बहुत ही आसान और किफायती तरीका है, जिसके जरिए किसान घर पर ही जैविक खाद बना सकते हैं।”
20677. एक किसान, तीन काम: हल्दी की खेती, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से लाखों का मुनाफा
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- गुजरात के भाविक ने मात्र 5 बीघा ज़मीन से हल्दी की जैविक खेती शुरू की थी और आज वह 50 बीघा में हल्दी उगा रहे हैं और प्रोसेसिंग करके लगभग 5 टन हल्दी पाउडर भी बना रहे हैं!
- गुजरात के सारंगपुर गाँव में रहने वाले 30 वर्षीय भाविक खचर पिछले 6 सालों से हल्दी की जैविक खेती कर रहे हैं। हल्दी उगाने के साथ-साथ वह प्रोसेसिंग भी खुद ही करते हैं। वह इन दिनों हल्दी की फसल और पाउडर, दोनों से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
- भाविक जैविक तरीकों से खेती करने वालों के एक समूह से भी जुड़ गए। किसानों के इस नेटवर्क के ज़रिए ही उन्हें इज़रायल जाने का मौका मिला। वहाँ उन्होंने प्रोसेसिंग के बारे में जाना। वह बताते हैं कि इज़रायल दौरे में उनकी मुलाक़ात वहाँ के अग्रणी किसानों से हुई। उन्होंने देखा कि कैसे वहाँ किसान खुद ही अपनी फसल में वैल्यू ऐड करके और पैकिंग करके बेचते हैं। इससे उन्हें ज्यादा कमाई मिलती है।
20678. गुरुग्राम जैसे शहर में घर को बनाया अर्बन फार्म, पूरे साल उगातीं हैं तरह-तरह की सब्जियां
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- हर किसी को गार्डनिंग का शौक नहीं होता है लेकिन कुछ ऐसी परिस्थति बनती है कि ऐसे लोग भी बागवानी की शुरूआत कर देते हैं। ऐसी ही कहानी हरियाणा के गुरुग्राम में रहने वाली रूचिका की है। उन्होंने जब आसपास के लोगों को गार्डनिंग करते हुए देखा और उन्हें महसूस हुआ कि बाजार से वह जो कुछ भी सब्जी लाती हैं, वह ऑर्गेनिक नहीं है तो उन्होंने भी किचन गार्डन की शुरूआत कर दी।
- रूचिका के गार्डन में आपको हर मौसम में सब्जी मिल जाएगी। फिलहाल, वह सर्दियों की सब्जियों के लिए अपने गार्डन को तैयार कर रही हैं। रुचिका कहती हैं, “2-3 तरह की मूली, 2 -3 किस्म की गाज़र (लाल, पीली, काली), हरी मिर्च, काली मिर्च, फूलगोभी, ब्रोकॉली, सलाद की लगभग 15 किस्में, पुदीना, तुलसी, धनिया, पार्सले, पत्तागोभी, चकुंदर, सरसों, बीन्स आदि अपने गार्डन में उगाती हूँ। इसके अलावा 15-16 किस्म के फूल के पौधे भी हैं।”
- अपने पूरे गार्डन की देखभाल रूचिका खुद करती हैं। उनका कहना है कि उनके घर से बहुत ही कम कोई कचरा बाहर जाता है, वह रीसाइक्लिंग, रियूजिंग और कम्पोस्टिंग में विश्वास करती हैं। उनके किचन का सारा वेस्ट खाद और बायोएंजाइम बनाने में इस्तेमाल होता है। यहाँ तक कि उनके गार्डन का भी जो वेस्ट होता है जैसे सूखे पत्ते या फिर पुराने मौसम के सब्जियों के पौधे, बेल जिनसे हार्वेस्ट ले ली गई है और जिन्हें अब निकालना है- सभी कुछ को वह बायोएंजाइम बनाने में इस्तेमाल कर लेती हैं।
20679. पेशे से डॉक्टर, लेकिन खेती के लिए जुनून ऐसा कि वियतनाम में किसान के घर रहकर ड्रैगन फ्रूट उगाना सीखा, 30 हजार पौधे लगाए, हर साल 1.5 करोड़ रुपए कमाई
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- अभी डॉ. श्रीनिवास 12 एकड़ जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की खेती कर रहे हैं, करीब 30 हजार प्लांट्स हैं, 80 टन तक का प्रोडक्शन करते हैं
- डॉ. श्रीनिवास 200 से ज्यादा किसानों को ड्रैगन फ्रूट उगाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं, वे कहते हैं कि एक एकड़ जमीन से किसान 5-8 लाख रु तक कमा सकते हैं
- श्रीनिवास कहते हैं, 'पहली बार ड्रैगन फ्रूट साल 2016 में देखा। उनके भाई एक पारिवारिक आयोजन के लिए ड्रैगन फ्रूट लेकर आए थे। मुझे यह फ्रूट पसंद आया और इसके बारे में जानने की जिज्ञासा हुई। फिर मैंने इसको लेकर रिसर्च करना शुरू किया कि यह कहां बिकता है, कहां से इसे इम्पोर्ट किया जाता है और इसकी फार्मिंग कैसे होती है।'
20680. Jharkhand: तीखी मिर्च की खेती से मालामाल हो रहे यहां के किसान, हर सप्ताह 20 हजार रुपये तक की कर रहे कमाई
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Dainik Jagran
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- पूर्वी सिंहभूम जिले के किसान अब पारंपरिक खेती में कम लाभ देखकर नई-नई फसल की खेती करने मे लगे हैं। हरी सब्जियों की खेती के लिए विख्यात पटमदा प्रखंड के किसान अब मिर्च की खेती कर अच्छा लाभ कमा रहे
- पटमदा प्रखंड के राखडीह निवासी किसान प्रहलाद महतो अन्य किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं। दैनिक जागरण से बातचीत करते हुए प्रहलाद महतो ने बताया कि गांव में हरी मिर्च की खेती लोगों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।
- उनके साथ ही गावं के संतोष महतो, सुधीर महतो और उसके परिवार द्वारा मिर्च की खेती के लिए अपनाई तकनीक और मेहनत ने पूरे परिवार को लाल व मालामाल कर दिया है। प्रत्येक किसान सप्ताह में दो क्विंटल मिर्च बेचकर 20 हजार रुपये कमा रहे हैं।