| Jan 01, 1970 | Daily Report |
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20661. How to Grow Avocados In Your Balcony? Amritsar Farmer Shares Step-by-Step Process
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
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Agriculture(Organic Farming)
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- Full of vitamins and a rich source of antioxidants and monounsaturated fats, avocado is often touted as a rich man’s food because of the high price that the fruit is available at. The average market rate per kilo ranges between Rs 100 to 2000, depending on the variety.
- But what if I told you that it is possible to grow the fruit at home with nothing but a small investment? It definitely might take some time before your plant starts fruiting, but once it does you can not only have it for free but also sell it commercially in various forms.
- spoke to Harmanpreet Singh, an avocado farmer from Amritsar who has two types of avocado trees in his farm. After running a successful avocado venture in countries like Ethiopia, Rwanda, and Kenya for a decade, he is now growing the fruit in India.Harmanrpeet gets a harvest of three quintal avocados per year, and he sells them at an average rate of Rs 400 per kilo. To encourage avocado plantations in India, he has grown his nursery as well.
20662. गुजरात: सहजन की खेती व प्रोसेसिंग ने दीपेन शाह को बनाया लखपति किसान
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- साल 2013 में वह अपने इस नए प्रोडक्ट को लेकर आनंद के कृषि मेला पहुँच गए। वहाँ राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अन्य कुछ प्रशासनिक अधिकारी भी आए थे। मुख्यमंत्री ने सभी किसानों की फसलों को देखा लेकिन वहाँ दीपेन ऐसे किसान थे जो फसल नहीं बल्कि वैल्यू एड करके प्रोडक्ट लेकर गए थे। सभी ने उनकी स्टॉल पर आकर इसके बारे में जानना चाहा। “मैंने बताया कि यह सहजन का पाउडर है और इसमें लगभग 22 पोषक तत्व हैं। हमारे देश में सहजन इतना ज्यादा होता है लेकिन फिर भी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और यह सब मैं यूँ ही नहीं कह रहा था। मेरे पास यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट्स की रिपोर्ट थी,” उन्होंने आगे कहा।
- साल 2015 में उनके अपने खेतों पर प्रोसेसिंग यूनिट बनकर तैयार थी। उन्होंने खुद एक वर्कशॉप से अपनी निगरानी में सहजन की फलियों और पत्तों की प्रोसेसिंग के लिए मशीन बनवाई। प्रोसेसिंग यूनिट सेट-अप करने के साथ-साथ उन्होंने सहजन की खेती 5 एकड़ से बढ़ाकर 12.5 एकड़ में शुरू कर दी। अब वह आसपास के इलाकों के किसानों से भी सहजन खरीदते हैं। जिस सीजन में किसानों को बाज़ार में अच्छा दाम नहीं मिलता, वह उस फसल को दीपेन कुमार को दे देते हैं।
- उनकी प्रोसेसिंग यूनिट से पूरे साल लगभग 10-12 लोगों को रोज़गार भी मिलता है। इसके अलावा, साल के जिन तीन महीनों में खेतों में कोई खास काम नहीं होता और मजदूरों के पास रोज़गार नहीं होता, उस समय उनकी प्रोसेसिंग यूनिट में काफी काम रहता है। इन तीन महीनों के लिए वह लगभग 70 मजदूरों को रोजगार देते हैं।
20663. “मैं बाहर से सिर्फ आलू-प्याज खरीदती हूँ, बाकी सब उगाती हूँ अपनी छत पर!”
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- बेंगलुरु में रहने वाली प्रतिमा अदीगा लगभग चार साल से अपनी छत पर गार्डनिंग कर रही हैं। उनका टेरेस गार्डन तीसरे और चौथे फ्लोर पर है और इसमें वह अपनी घर की ज़रूरत की सभी तरह की सब्जी, फल और फूल उगाती हैं। उनके किचन में इस्तेमाल होने वाली लगभग 90% सब्ज़ियाँ उनके गार्डन से आती हैं। बाहर से वह सिर्फ आलू या प्याज खरीदती हैं।
- प्रतिमा को गार्डनिंग का शौक अपने पापा से मिला। लेकिन ज़िंदगी की भाग-दौड़ में वह कभी गार्डनिंग नहीं कर पाई और चार साल पहले जब उन्हें मौका मिला तो उन्होंने इसे हाथों-हाथ लिया। गार्डनिंग में राजेंद्र हेगड़े और विश्वनाथ (अब स्वर्गीय) प्रतिमा के गुरु हैं और उनकी ही वर्कशॉप के बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने ठान लिया कि अब वह खुद ही सब्जियाँ उगाएंगी। प्रतिमा ने लगभग 20 गमलों से गार्डनिंग की शुरूआत की।
- वह अपने गार्डन में लौकी, कद्दू, पेठा, टमाटर, मिर्च, बीन्स, बैंगन, शकरकंद, हल्दी, अदरक, निम्बू, गोभी, ब्रोकली, तोरई, खरबूज, शलजम, खीरा, मूली, गाजर, सभी तरह की पत्तेदार सब्जी और फूल आदि उगाती हैं। इनमें भी वह अब तक 30 किलो कद्दू, 70 किस्म के टमाटर, 15 किस्म की बीन्स, 9 किस्म की शकरकंद आदि उगा चुकी हैं। वह अपने गार्डन की प्लानिंग ही इस तरह करती हैं कि उनके किचन में पूरी आपूर्ति रहे। उनके लिए गार्डनिंग उनका स्ट्रेस बस्टर है और उन्होंने अपने बेटे को भी गार्डनिंग का महत्व समझाया है।
20664. महाराष्ट्र: सफेद चंदन और काली हल्दी की सफल खेती से इस किसान से बनाई अपनी पहचान
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- महाराष्ट्र में लातूर जिले के रहने वाले धनंजय राउत हमेशा से ही खेती में कुछ अलग करना चाहते थे। उनके पिता और आस-पास के किसान सामान्य खेती कर रहे थे लेकिन धनंजय की ख्वाहिश थी कि खेती में कुछ अलग किया जाए। इसके लिए उन्होंने एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट से पॉलीहाउस लगाने की ट्रेनिंग भी ली। वह बताते हैं, “पारंपरिक खेती में ज्यादा नहीं बचता था। ऐसे में एक ऐसे रास्ते की तलाश थी, जिसमें कम पानी में अच्छा नतीजा मिले। सबको पता है कि लातूर में पानी की समस्या कितनी रहती है। इसलिए मैं हाई टेक खेती करना चाहता था।”
- धनंजय ने अपने एक एकड़ ज़मीन पर लगभग 200 चंदन के पेड़ लगाए। चंदन की कमर्शियल वैल्यू बहुत ज्यादा है इसलिए वह इसकी खेती के लिए कृषि विभाग से भी मार्गदर्शन लेते रहे। वह बताते हैं कि जब एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट को पता चला कि कोई किसान ऐसा कुछ ट्राई कर रहा है तो उन्होंने दूसरे किसानों को भी बताया और फिर उनके यहाँ लगातार किसानों का, कृषि से जुड़े एक्सपर्ट्स का और मीडिया का भी आना शुरू हो गया। दूसरे किसान भी उनसे चंदन के पौधों की मांग करने लगे।
- धनंजय के मुताबिक, चंदन की फसल किसानों को इन्वेस्टमेंट के तौर पर लगानी चाहिए। आप शुरुआत में 8 से 10 पेड़ लगा लीजिये अपने खेत में और साथ में, सामान्य तरीकों से अपनी खेती करते रहिए। चंदन के पेड़ में बीमारी लगने का खतरा रहता है लेकिन यह ऐसी कोई बीमारी नहीं जिसे कंट्रोल न किया जा सके।
20665. Organic Farmer Makes Lakhs Growing Fruit in Drought-Prone Beed, Inspires 50 Others
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- This Beed farmer switched to organic farming after attending a seminar. He made a fortune growing organic papaya and watermelon.
- However, a farmer in Parali taluka of Beed district, a perennially drought-stricken area of the Marathwada region in Maharashtra, chose to break tradition and has become quite successful pioneer.“I used to cultivate soybean, grams and other arid crops common to the region. However, a guiding session on organic farming and its success on fruit crops convinced me to try growing papaya on one acre of land,” says Sandip Gite, a farmer in Nandagoul village.
- Sandip said organic techniques required less water and were a more natural or method of farming.“The investment costs came down and also crop management became easier,” he adds.The farmer said in seven months of the harvest, he earned Rs 3 Lakh from the crop
20666. गुरुग्राम: जॉब छोड़कर घर से शुरू किया बेकरी बिज़नेस, अब प्रतिदिन कमातीं हैं 10 हज़ार रूपये
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- सोशल मीडिया के जमाने में दुनिया अपनी मुट्ठी में हो गई है। ऐसे में घर से बिजनेस शुरू करना बहुत आसान हो गया है। लेकिन कुछ पल थमकर जरा उस वक्त के बारे में सोचिए और कल्पना कीजिए जब सोशल मीडिया नहीं था। उस वक्त आपके काम को लाइक और शेयर करने वाला कोई नेटवर्क मौजूद नहीं था। ऐसे ही दौर में गुरुग्राम की रहने वाली इला प्रकाश सिंह ने अपनी बेकरी का काम शुरू किया था।
- इला ने लगभग 5,000 रुपये के निवेश से अपना बिजनेश शुरू किया था और आज वह करीब 10,000 रुपये हर दिन कमाती हैं। आज वह केक, कुकीज, चॉकलेट्स, ग्लूटेन फ्री ब्रेड, डेसर्ट, आर्टिसनल ब्रेड जैसे बेकरी प्रोडक्ट की 40 से अधिक किस्में समेत अन्य स्वादिष्ट आइटम जैसे पैटी, स्टफ्ड बन्स, पिज्जा और गिफ्ट हैम्पर की पूरे एनसीआर में डिलीवरी करती हैं।
- इला कहती हैं, “जब मैंने बिजनेस शुरु किया तो पहले से कोई मेन्यू निर्धारित नहीं था और न ही कोई योजना थी। मैंने खुद ही पोस्टर बनाया और काम शुरू कर दिया। मैं विंडसर मैनर शेरेटन में अपने काम के दिनों के दौरान जो रेसिपीज़ बनाती थी, इसी से मैंने शुरूआत की। अपने अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स के चारों ओर जाती थी और उस पर अपने कॉन्टैक्ट डिटेल के साथ विज्ञापन चिपकाती थी।”
20667. Https://hindi.thebetterindia.com/49865/gujrat-farmer-earns-lakhs-with-zero-budget-farming-cancer-healthy-food-farming/
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- सूरत के रामचंद्र पटेल की जीरो बजट नैचुरल फॉर्मिंग तकनीक से खेती में इनपुट लागत काफी कम हुई और उन्हें रिटर्न को बढ़ाने में मदद मिली। हर साल उन्हें एक एकड़ भूमि से डेढ़ लाख रुपए और 18 एकड़ से 27 लाख रुपये का मुनाफा होता है।
- रामचंद्र, मुंबई के अस्पताल में लगभग 13 बार गए और तब जाकर उन्हें डॉक्टरों से अपने पिता की बीमारी का कारण पता चला। उन्हें पता चला कि अच्छी उपज के लिए फसलों पर रसायन और हानिकारक कीटनाशक के छिड़काव के कारण वह कैंसर की चपेट में आए।यह सुनकर रामचंद्र की आंखें खुल गई। उनके पिता ने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के कारण दम तोड़ दिया लेकिन रामचंद्र ने रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक तरीके से खेती करने का फैसला किया। 1991 से उन्होंने गैर-कृषि भूमि के एक प्लॉट पर जीरो बजट नैचुरल फॉर्मिंग (ZBNF) अपनाते हुए काम करना शुरू किया और इसे एक उपजाऊ जमीन में बदल दिया।
- रामचंद्र ने द बेटर इंडिया को बताया, “मेरी इनपुट लागत शून्य है। मेरे खेत की मिट्टी काफी उपजाऊ है। जिसमें अधिक पैदावार होती है और मुनाफा भी अधिक होता है। सच कहूँ तो अब मेरा इम्युनिटी सिस्टम पहले से बेहतर हुआ है और अब मैं अपने ग्राहकों को जहर नहीं खिला रहा हूँ।”
20668. दिल्ली: व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे फूलों का सफल व्यवसाय चलातीं हैं यह 80 वर्षीया दादी
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- “लॉकडाउन के पहले ही महीने से मुझे ग्राहकों के फोन आने लगे, उनमें से कुछ लोगों ने बताया कि उदासी भरे समय में फूल ही उन्हें खुशी देते हैं। लोगों के कॉल से मैं काफी उत्साहित हुई और मैंने अपने ग्राहकों को फूल बेचने के साथ ही डिलीवरी सर्विस देनी भी शुरू कर दी।” -स्वदेश चड्ढा
- हर हफ्ते रानी Delhi-NCR के कई घरों में लगभग 100 गुच्छे फूल भेजती हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
- अक्टूबर 2019 में गुरुग्राम के होराइजन प्लाजा में लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार में उनका पहला फ्लावर स्टॉल लगा। जिसमें रानी अपने छोटे मनीबॉक्स के साथ बैठीं। वह ग्राहकों से बातचीत कर रही थीं और पौधों को लंबे समय तक मेंटेन रखने के लिए उन्हें छोटे-छोटे टिप्स दे रही थी।
20669. 1 एकड़ तालाब में मोती की खेती से कमा सकते हैं 5 लाख रूपए, समझें बिहार के इस किसान का मॉडल
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- 2009 में बिहार के जयशंकर ने 1 बीघा जमीन में 5 फीट गहरा और 15 फीट की मिट्टी की बाउंड्री वाला एक तालाब खोदा। कम से कम 5,000 मसल्स वाले तालाब से सालाना दर्जनों बाल्टी-मोती मिलते हैं। समझिये इनका मॉडल।
- `बेगूसराय के तेतरी गाँव में पले-बढ़े जयशंकर ने 1.5 बीघा जमीन में इकोलॉजिकल खेती का एक अनोखा सिंबायोटिक मॉडल तैयार किया है। इसमें मोती की खेती और मछली पकड़ने के साथ जैविक सब्जी, फल,औषधीय जड़ी बूटियों का वर्टिकल गार्डन, पोल्ट्री, वर्मीकम्पोस्ट और बायोगैस का उत्पादन किया जाता है।
- भुवनेश्वर स्थित इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च-सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेशवाटर एक्वाकल्चर (ICAR-CIFA) के योगदान के बारे में जानने के बाद वह सहायता के लिए उनके पास पहुँचे। मोती की खेती में वहाँ के अनुभवी वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया के माध्यम से उनका मार्गदर्शन किया और जरूरी ट्रेनिंग भी दी।
20670. खेती के लिए छोड़ी अमेरिका में नौकरी, अब बड़े-बड़े होटलों में जाते हैं इनके उत्पाद
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- गायत्री ने महाराष्ट्र में जैविक खेती शुरू करने के लिए 10 साल पहले अमेरिका में नौकरी छोड़ दी। अब वे अपने 10 एकड़ जमीन पर फलों और सब्जियों से लेकर, औषधीय पौधों की भी खेती करती हैं।
- लगभग एक दशक पहले, गायत्री बोस्टन स्थित पर्यावरण संरक्षण एजेंसी में बतौर पर्यावरण विश्लेषक काम कर रही थी। अमेरिका छोड़ने के बाद जब वह पहली बार अपने फार्म ‘वृंदावन’ आईं, तो यहाँ मुख्यतः एक आम का बाग था, जिसमें सात किस्मों के 500 पेड़ लगे थे। साथ ही कुछ नारियल, काजू और काली मिर्च भी लगे थे।
- लेकिन आज इस फार्म में आपको अलग-अलग प्रजाति के ढेर सारे आम के पेड़, केला, पपीता, शहतूत, चीकू, अनानास, कटहल, जंगली जामुन आदि के पेड़ दिखेंगे। साथ ही गायत्री मसाले और सब्जी की भी खेती कर रही हैं। हल्दी, अदरक से लेकर काली मिर्च तक वह उगा रही हैं। सब्जी की बात करें तो इस फार्म में कद्दू, टमाटर, बैंगन, आदि की भी खेती हो रही है।