| Jan 01, 1970 | Daily Report |
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20711. केरल के पूर्व इंजीनियर ने लॉकडाउन में शुरू कर दी गेंदे की खेती, हर महीने कमा रहे हैं 35 हजार रुपये
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
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- केरल के अरनमुला के रहने वाले 72 वर्षीय एन.के. कृष्णन नायर अपने खेतों से हर दिन लगभग 15-20 किलो गेंदे का फूल तोड़ते हैं। इन फूलों को बेचकर वह हर महीने करीब 35,000 रुपए कमा लेते हैं।
- बेंगलुरु के पास होसुर के अपने दोस्तों से संपर्क कर कृष्णन नायर ने उनसे गेंदे के लगभग 1,000 पौधे लिए। उन्होंने उनसे खेती के बारे में सलाह और जानकारी भी इकट्ठा की।
- कृष्णन नायर के खेत से हर दिन लगभग 15-20 किलोग्राम गेंदे के फूल निकलने लगे। इन्हें वह बाजारों में बेचकर हर महीने लगभग 35,000 रुपये की कमाई करने लगे। पिछले कुछ महीनों में कोझेनचेरी, पठानमथिट्टा के फूल विक्रेता हर दिन उनके खेत से फूल खरीदते हैं।
20712. यूरोप की यात्रा ने बदला मन तो दिल्ली की ग्लैमरस लाइफ छोड़ गाँव में शुरू कर दी सेब की खेती
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- गोपाल इन दिनों अपने आठ एकड़ के बगीचे से लाखों की कमाई कर रहे हैं। इसके अलावा पाँच एकड़ में उन्होंने हल्दी और अदरक उगाया है। इसके साथ ही 7.1 फीट ऊंचा धनिया उगाकर उन्होंने गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी नाम दर्ज करवाया है। गोपाल को उत्तराखंड सरकार ने उद्यान पंडित और देवभूमि पुरस्कार से भी सम्मानित किया है।
- गोपाल अब हल्दी का प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की तैयारी कर रहे हैं। वह अपने खेत में उगाई गई हल्दी को खुद प्रोसेस करके बेचना चाहते हैं। वह दावा करते हैं कि उनका सेब का बगीचा उत्तराखंड का पहला आर्गेनिक सर्टिफाइड बगीचा है।
- वह किसानों को पौध और बीज वितरण भी करते हैं। साथ ही उन्हें बागवानी से जुड़ी तकनीकी जानकारी भी मुहैया कराते हैं। उनका मकसद उत्तराखंड में प्रगतिशील और प्रशिक्षित किसानों को तैयार करना और आगे बढ़ाना है।
20713. लोगों को सही खाना मिले इसलिए लंदन की नौकरी छोड़ खेती शुरू की, खेती सिखाने के लिए बच्चों का स्कूल भी खोला, 60 लाख टर्नओवर
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- नेहा 16 एकड़ जमीन पर खेती कर रहीं है, इसमें नोएडा में तीन एकड़ पर सब्जियां, मुजफ्फरनगर में 12 एकड़ में फल, भीमताल में एक एकड़ पर ऑर्गेनिक हर्ब की फार्मिंग करतीं है
- वे अपने प्रोडक्ट ऑनलाइन भी बेचती हैं, हर महीने करीब 500 ऑर्डर आते हैं, जो किसान अपने उत्पाद मार्केट तक नहीं ले जा पाते, उनके प्रोडक्ट भी नेहा ऑनलाइन बेचती हैं
- नेहा बताती हैं, 'दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद मैं एक सोशल ऑर्गनाइजेशन से जुड़ गई। मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा सहित कई राज्यों में एजुकेशन, हेल्थ जैसे इश्यूज के ऊपर काम किया। 2012 में लंदन चली गई। इसके बाद 2015 में इंडिया लौटी तो फिर से एक सोशल ऑर्गनाइजेशन के साथ जुड़ गई। करीब दो साल काम किया।
20714. At 79, Mumbai Woman Uses Secret Recipe to Start Chai Masala Business from Home
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- During the lockdown, 79-year-old Kokila Parekh started a chai masala business from Mumbai home to keep herself active.
- The masala powder recipe has been passed down by her ancestors and Mrs. Parekh has been making chai and milk with it for her family members for years now. When guests come home they are served her famous masala chai with some hot snacks.
- Initially, Mrs. Parekh would make a few extra kilos to distribute among these circles but, last month, she decided to start selling her chai masala powder across the country.
20715. बाराबंकी के सरकारी टीचर ने छुट्टी लेकर, फल-सब्जियों की खेती शुरू की, सालाना एक करोड़ हो रही है कमाई
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- अमरेंद्र अभी 60 एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं, 30 एकड़ जमीन पर पारंपरिक फसल और बाकी 30 एकड़ पर फल और सब्जियां उगाते हैं
- उनकी टीम में 35 लोग काम करते हैं, इसके साथ ही आसपास के गांवों के किसान भी बड़ी संख्या में उनके साथ जुड़े हुए हैं
- अमरेंद्र कहते हैं कि मैंने तय कर लिया था कि अब जो भी हो खेती ही करना है। मैंने गूगल और यूट्यूब पर थोड़ा खेती के बारे में सर्च किया। फिर केले की खेती का आइडिया मिला। जो किसान पहले से इसकी खेती करते थे, उनके पास जाकर इसके बारे जानकारी जुटाई। खेती की बारीकियों को समझा।
20716. लॉकडाउन में घर को हरा-भरा करने की शुरू की मुहिम, आम-अनार से लेकर गाजर-मूली भी मिलेगा यहाँ
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- इंदौर की श्वेता वैद्य ने जब फूड स्टॉल लगाने का सोचा, तब उनके पास काम का कोई एक्सपीरियंस नहीं था, मजबूरी में शुरू करना पड़ा था बिजनेस
- शुरू के बीस दिन ग्राहक मिलना मुश्किल हो गए थे, फिर पड़ोस में लगने वाले फूड स्टॉल को देखकर आया नया आयटम रखने का आइडिया
- श्वेता के पास जॉब करने का भी विकल्प था, लेकिन उन्होंने खुद का कुछ सेट करने का सोचा और बढ़ गईं आगे
20717. बेटी को थी दूध से एलर्जी, मां ने लुधियाना में शुरू किया ऐसा काम, आज बन गई सफल कारोबारी
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- बेटी को चौदह वर्ष की उम्र में दूध से एलर्जी हुई और पेट दर्द रहने लगा तो मां ने उसे दूध से बने उत्पादों के बजाय अन्य उत्पाद देने शुरू किए। उसको दूध की जगह बादाम व सोया दूध देना शुरू कर दिया, ताकि स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव न पड़े। इसके बाद उन्होंने केमिकल मुक्त बेकरी उत्पाद बनाना शुरू कर दिए।
- ज्योति गंभीर का नाम आज कामयाब कारोबारियों में शुमार है। उन्होंने बताया कि यह उत्पाद बनाने के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के होम साइंस कालेज से प्रशिक्षण लिया। पहले अपने घर व रिश्तेदारों के लिए बिना दूध व दूध से बने बिना केमिकल के उत्पाद बनाने शुरू किए। इनको सभी ने सराहा। उन्होंने बताया कि जब भी हम चाय के साथ एक बिस्कुट भी खाते हैं, मानो हम केमिकल खाते हैं, इसलिए मैंने ठान लिया कि परिवार और अन्य लोगों के लिए टेस्ट विद हेल्थ के पैमाने पर उत्पाद बनाऊंगी।
- ज्योति गंभीर ने बताया कि जब मैंने अपने हुनर को बढ़ाने के लिए पीएयू से दो महीने की ट्रेनिंग ली तो तो मिनिस्ट्री आफ एग्रीकल्चर के तहत राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) ने स्कीम शुरू कर फार्म भरवाए थे। तब उन्होंने अपने तैयार किए जा रहे उत्पादों को लेकर फार्म भरा। उनका फार्म मिनिस्ट्री आफ एग्रीकल्चर ने स्वीकार कर प्रशिक्षण देना शुरू किया। तब उनके बनाए गए केमिकल रहित बेकरी उत्पादों को विभाग के अधिकारियों ने स्वाद चखा और विभाग की ओर से उनको बेकरी का कारोबार शुरू करने का प्लेटफार्म देने का अवसर दिया। अब उनको आरकेवीवाई ने 16 लाख रुपये की ग्रांट जारी की है, ताकि बेकरी प्लांट स्थापित करने के लिए मशीनरी खरीदी जा सके।
20718. दादी का बनाया खाना लोगों तक पहुँचाने के लिए छोड़ी नौकरी, अब 1.5 करोड़ रुपये है सालाना आय
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- दादी-चाची के हाथों से बने भोजन का स्वाद ही कुछ और होता है। इसी स्वादिष्ट स्वाद को घर-घर तक पहुँचाने के लिए मुरली गुंडन्ना ने बेंगलुरु में अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने “फ़ूड बॉक्स” नाम से एक स्टार्टअप की शुरूआत की जहाँ से घर का पका खाना लिया जा सकता है।
- मुरली कहते हैं, “मेरे बॉस ने इसे बहुत ही सकरात्मक तरीके से लिया और उन्होंने मुझे तीन महीने पेड लीव देने की पेशकश की।” उन्होंने सप्ताह में 10 फूड बॉक्स बेचने से शुरूआत की और अब वह एक दिन में हज़ारों फूड बॉक्स बेचते हैं। मुरली इसका श्रेय अपनी दादी और चाची को देते हैं। मुरली के स्टार्टअप की यह कहानी बड़ी दिलचस्प है।
- शुरूआती दिनों में मुरली एक दिन में 15-20 बॉक्स बेचते थे जबकि आज की तारीख में वह एक हफ्ते में 2,000 बॉक्स बेचते हैं।
20719. हैदराबाद: मंदिरों से फूल इकट्ठा कर उनसे अगरबत्ती, साबुन आदि बना रहीं हैं ये सहेलियाँ
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- हैदराबाद में रहने वाली माया विवेक और मीनल दालमिया, Holy Waste ब्रांड के अंतर्गत फूलों को प्रोसेस करके अगरबत्ती, धूपबत्ती, खाद और साबुन जैसे उत्पाद बना रहीं हैं!
- माया और मीनल ने सबसे पहले एक मंदिर में बात की और वहाँ से फूल आदि को इकट्ठा करके घर पर लाने लगीं। उन्होंने पहले अपने घर पर इनकी प्रोसेसिंग की। जैविक खाद बनाना उन्हें आता था इसलिए इसमें ज्यादा परेशानी नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने अगरबत्ती बनाने पर काम किया। घर पर वह छत पर फूलों को सुखातीं और फिर इन्हें मिक्सर में पिसती और फिर आगे की प्रक्रिया करतीं। एक-दो बार के ट्रायल से जब वह अगरबत्ती बनाने में सफल रहीं तो उन्होंने इसमें आगे बढ़ने की सोची।
- सभी मंदिरों में उन्होंने अपने डस्टबिन रखवाए हुए हैं और इन्हें प्रोसेसिंग यूनिट तक लाने के लिए कामगार लगाए हैं। मंदिरों के अलावा शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में भी बचने वाले फ्लोरल वेस्ट को वह इकट्ठा करके प्रोडक्ट्स बनाने में लगा रही हैं। हर दिन वह लगभग 200 किलो फ्लोरल वेस्ट को नदी-नाले में जाने से रोक रही हैं।
20720. मिलिए ‘मखाना मैन ऑफ इंडिया’ सत्यजीत सिंह से, जिन्होंने बिहार में बदल दी मखाना खेती की तस्वीर
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- मखाना को सुपरफूड के रूप में जाना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज दुनिया में कुल मखाने का 90 फीसदी उत्पादन बिहार में होता है? बिहार में मखाना खेती को लेकर एक क्रांति की शुरुआत करने वाले सत्यजीत सिंह हैं, जिन्हें ‘मखाना मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है। सत्यजीत आज बिहार में 50 फीसदी मखाना उत्पादन के लिए जिम्मेदार हैं और अनुमान है कि वह अगले 2-3 वर्षों में कुल मखाना उत्पादन में 70 से 75 फीसदी योगदान देने में सफल होंगे।
- साकेत के अधिकांश किसान साथी गेहूँ और धान की खेती करते हैं, लेकिन उन्होंने मखाना की खेती करने का फैसला किया। इससे साकेत को न सिर्फ अपने परिवार को कर्ज से उबारने में मदद मिली, बल्कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में भी मदद मिली।
- साकेत मखाना के बीज को बेच कर सालाना 3.5 लाख रूपये कमाते हैं और फिर बचे हुए बीजों को कुछ दिनों के बाद 30% अधिक मूल्य पर बेचते हैं। इस तरह हर साल उन्हें 4.5 लाख रूपए की कमाई होती है।